एक समानांतर आयाम में:
भूदेवी देवी और नभदेव स्वर्ग में निवास करते थे । दोनों
के पास सृजन की शक्ति थी किन्तु सहभागिता की कमी। उन्होंने सोचा क्यों न आपसी
सहयोग से कोई रचना की जाय। दोनों ने मिल के जो निर्माण किया उसका नाम रखा
सुन्दरवन।
भूदेवी ने पेड़ पौधे और सब जीव जंतु बनाये। नभदेव ने बादल बनाय
और कहा कि इन्ही से तुम्हारी रचना में जीवन का संचार होगा। मतलब ज़्यादा काम
भूदेवी ने किया और नभदेव ने पल्ला झाड़ लिया। दोनों ने मिल के सुंदरवन के बीच
एक पर्वत का भी निर्माण किया जिसकी चोटी बादलो के भी ऊपर थी।
भूदेवी का ह्रदय माँ की सी ममता से भरा था। उन्होंने निर्णय लिया की सुंदरवन को अपने बच्चे की तरह
पालने के लिए उसी में समाहित हो कर रहेंगी और वहाँ रहने वाले सभी जीवो को अच्छी शिक्षा
और संस्कार प्रदान करेंगी। वहीँ नभदेव ने decide किया कि पहाड़
का view अच्छा है और वे उसी दुर्गम पर्वत की चोटी पे रहने लगे।
सुंदरवन में भूदेवी ने सभी जीव जंतुओं को साथ में प्रेम और अहिंसा के
मूल्यों के साथ नैसर्गिक
सिद्ध्नातो का पालन करते हुए आपसी मेल मिलाप से रहने
की सीख
दी। पर वे थे तो जानवर ही, इतना नहीं समझ पाए. तो जितना समझ पाय
वो ही किया।
सो हुआ यूँ के सुंदरवन में हिंसा होती तो थी पर हमेशा एक नाज़ुक संतुलन
बना a रहता था. पेड़ पौधे फल और पत्तियां बनाते जिन्हे शाकाहारी जानवर खाते और
फिर मांसाहारी जानवर शाकाहारी
जानवरों को। उदाहरण के लिए अगर हिरन की संख्या ज़्यादा हो जाती तो पेड़
पौधे और हरियाली खत्म हो जाती इसलिए शेर हिरन खा जाते । इसी प्रकार अगर शेर
ज़्यादा हो जाते तो हिरन विलुप्त हो जाते और इसलिए शेरो ने अच्छी फैमिली प्लानिंग
करी और हम दो हमारे दो का नुस्खा अपनाया।
कहने का तात्पर्य ये है की सभी जानवर अपना अपना काम यथाषक्ति करते थे
और सुन्दरवन फल फूल रहा था । अब जब भी किसी जगह बहुत सारे प्राणी होते हैं तो
कुछ निपुण होते हैं और कुछ अनिपुण। तो सुंदरवन के माँसाहारी जानवरों में सबसे
निपुण प्रजाति थी लोखड़ी. रिश्ते में लोमड़ी इनकी बुआ लगती थी.। ये रात के
अंधेरे में देख पाती थी और ज़रा सी आहट दूर से सुन लेती थी. आकार छोटा होने की वजह
से छिप के हमला करती थी मारक क्षमता के साथ । इस के ठीक विपरीत सब से खराब
शिकारी थे गुफा में रहने वाले बन्दर. न इनके पास सींघ थे न तेज़ नाखून.। शिकार
में इतने बेकार की माँसाहारी से सर्वभक्षी हो चले थे. जहां जो पड़ा मिले खा लेते
थे.। कभी कभी लगता था की इनकी प्रजाति सिर्फ इसलिए जीवित है क्यूंकि ये बच्चे
फटाफट पैदा करते रहते हैं। एक और अच्छी बात थी की खाद्य श्रृंखला के बीच में
आने की बजाय सहजीवन और सहभागिता के कारण जीवित बचे रहते थे। गुफा के बंदरो के
बच्चे बिना बाल के नंगे इधर उधर घूम के दूसरे जीवों के साथ मित्रता कर लेते थे । गाय,
बकरी और घोड़े से बंदरो ने अपने बच्चो की वजह से उन्होंने कूटनीतिक सम्बन्ध बना लिए
थे. मगर ये सम्बन्ध हर किसी से अच्छे नहीं थे.। गधे उन्हें कुछ संदेह से
देखते थे और सभी शिकारी जानवर उन्हें मुँह नहीं लगाते थे. जो की शायद उन के लिए
अच्छा ही था. लोखड़ी तो उन्हें धौंसिया के रखती थी
कुछ बुद्धिजीवी बंदरो ने आपस में मंत्रणा करी कि ऐसा कोई तो तरीका
होगा जिस से उनकी सामाजिक स्थिति में कुछ सुधार आये । चार साहसी बन्दरो को
चुना गया. ये निर्धारित हुआ की ये चार बन्दर दुर्गम पहाड़ पे चढ़ के नभदेवता के घर
जाएंगे और उन्हें प्रसन्न कर वरदान मांगेंगे।
ऐसे फ़ालतू काम करने की आदत और योग्यता इन बंदरों में बहुत थी। बड़ी
मुश्किल से एक दूसरे के सहारे चढ़ाई कर के चारों बन्दर नभदेव के पहाड़ी Penthouse तक
पहुंचे। नभदेव ने बादलों के नीचे किसी को नहीं देखा था. वो इन विचित्र
जंतुओं को देख बड़े खुश हुए और सोचा की भूदेवी ने भेजा होगा. वे बोले, “मांगो क्या
मांगते हो?” बंदरो ने सोचा कि छेड़ते छेड़ते भूल ही गये की क्या माँगना है. जब
बहुत लम्बी लड़ाई लड़ो तो कई बार वजह भूल जाते हैं और बस लड़ते रहते हैं.। सा ही
उनके साथ हुआ. पहले ने बोला की कुछ ऐसा मांग लेते हैं जिस से आराम से नीचे उतर
पाएं। दूसरे ने बोलै की लम्बी आयु मांग लेते हैं. तीसरे ने बोलै की क्यूँ न
सदबुद्धि माँग ले, शायद हम सुन्दरवन को एक बेहतर जहां बना पावैं। चौथे ने
पहले तो तीसरे के सर पे तपली मारी और सीधे नभदेव से बोले की हमें कोई ऐसा अस्त्र
प्रदान करो जिस से हम सर्वश्रेष्ठ शिकारी बन जाएँ.। हंसे और बोले मुझे तुम बड़े
मजेदार लगे.। मैं तुम्हे ये दिव्य पुष्प प्रदान करता हूँ परन्तु क्यूंकि तुम
4 लोग मिल के आये हो, इस को सर्वदा उठाने और सक्रीय करनेके लिए चार बन्दर लगेंगे। क
बात और, क्यूंकि तुमने एक विध्वंसक वरदान माँगा है, आज के बाद तुम मेरे से कुछ
नहीं मांग सकते.। कूदते और कुड़कुड़ाते हुए चारो बंदरो ने दिव्य पुष्प उठाया और
नीचे उतरे। उतर के वो ही किआ जो शक्ति मिलने पे अधिकाँश लोग करते हैं -
दुरूपयोग।
दिव्य पुष्प की शक्ति थी के 4 बन्दर उसे उठा के किसी भी जीव को छुआ दे तो
वो जल जाता। चारो के सीधे पकडे रहने पे भी उसमे से धुंए के साथ ऊष्मा और
रौशनी निकलती रहती । अब रात के अँधेरे में भी उन्हें किसी से डरने की ज़रुरत
नहीं थी. बस ज़रुरत थी तो 4 बंदरो की. जैसे ही 4 बन्दर इकट्ठे हो कर पुष्प उठा लें,
वो किसी पर भी भारी पड़ जाते. पहली बार उन्हें शक्तिशाली होने का एहसास हो रहा था.
उन्होंने पहले अपने भरण पोषण पे ध्यान दिया और फिर आई बारी बदला लेने की. जो जानवर
उनका उपहास करते थे, कोई भी चार बन्दर उनको जला के खा जाते. अपने सर्वशक्तिशाली
होने के अहंकार की वजह से बंदरों ने ‘तुच्छ’ जीवों से बात करना तक छोड़ दिया. एवं
खा खा के मोटे तगड़े हो गए.
जब पानी सर के ऊपर पहुँच गया तो जानवरो में सर्व दलीय बैठक हुई. कई जानवरों
ने गधे को आगे कर के बंदरो के दोस्तों से बात करी. मगर कोई लाभ न हुआ. गाय ने
बतलाया कि ये बन्दर अब पहले जैसे नहीं रहे. अब वो हमें बराबरी का नहीं समझते. मेरे
और बकरी के बच्चे का दूध चुरा लेते हैं. पीछे से घोडा बोला कि मेरे तो ऊपर चढ़ के
बैठ जाते हैं. बकरी ने सेहम के मुंडी हिलाई. गाय ने आगे बोलै कुछ बोलो तो 4 बन्दर
इकट्ठे हो के धौंस जमाते हैं पुष्प की. अब और कोई जानवर फूल उठा भी नहीं सकता था.
इस प्रकार पूरा सुन्दरवन बंदरो की क्रूरता से आतंकित था.
समय के साथ बंदरो की क्रूरता और बढ़ी. दूसरी सर्व दलीय बैठक में गधो के नेता
ने कहा "बंदरो के पहले सब से शक्तिशाली लोखड़ थी. बंदरो के पुष्प की वजह से
सबसे ज़्यादा नुक्सान उसका ही हुआ. अब रौशनी की वजह से उसके सभी शिकार बंदरो के आस
पास रहने लगे और उसे दूर से देख के ही भाग जाते. जान बूझ कर कई बार बंदर उसे
परेशान करते हैं.” गधो के नेता ने लोखड़ी को थोड़ा ऊपर चढ़ाया ताकि वो बंदरो का सामना
करे. लोखड़ी अपना दबदबा कम होने से आहत थी और गधों की बात सुनके उसमें और आक्रोश आ
गया और तन तानते हुए बंदरों की गुफा पे पहुंची. पर बंदरो ने उसका स्वागत दिव्या
पुष्प की चकाचौंध रौशनी से किया. उसे बंधक बना लिया और तरह तरह की यातनाएं दी. उन्होंने
दिव्य पुष्प एक पेड़ के नीचे रखा और उसे पेड़ से उल्टा लटका दिए. लोखड़ी का पुष्प से
निकलते धुएं से दम घुटने लगा. ऐसे कठिन आपदा के समय लोखड़ी ने भू देवी को याद किआ
और तपस्वी की तरह उल्टे लटके लटके जाप कर ने लगा : श्री भु हाँ श्री भु हाँ. माता
भूदेवी से उसकी ये दशा देखी न गयी. वे प्रकट हुई और बोली मांगो वत्स क्या वरदान
मांगते हो?
लोखड़ी ने कहा “माँ आप बंदरो का सर्वनाश कर दो”.
भूदेवी बोली, “मैं स्वयं बहुत परेशान हूँ बंदरो से! वो जानवरों के जल
स्त्रोतों में मलमूत्र कर देते हैं, पूरे वन में किसी को भी खा जाते हैं, इस से
संतुलन बिगड़ रहा है... किन्तु है तो ये भी मेरी ही संतान, अपनी संतान को नष्ट करने
का वरदान तुम्हे कैसे दे दू?”.
लोखड़ी ने कहा, “तू क्यों न आप बंदरों को सुन्दरवन से बाहर निकाल दो!”
भूदेवी बोली “ये भी नहीं हो सकता, अगर इन्हे सुन्दरवन से बाहर निकाला, तो
ये दिव्य पुष्प से पेड़ पौधे नष्ट करेंगे और सुंदरवन ही नहीं बचेगा.”
लोखड़ी बोली, “माँ, इनकी धूर्तता और
धृष्टता की कोई सीमा नहीं है! आज इन्होने ने मुझे उल्टा लटकाया है, कल को दूसरे
जीवो को प्रताड़ित करेंगे. वो भी तो आप की संतान हैं! धीरे धीरे ऐसे ही सम्पूर्ण वन
नष्ट हो जाएगा और ये खुद का भी नाश कर लेंगे.”
भूदेवी को लोखड़ी की बात में वज़न लगा. उन्होंने बोला, मैं तुम्हे वो साधन
दूंगी जिस से तुम भी शक्ति प्राप्त कर पाओगे नभदेव से. मैं तुम्हे हितकारी शक्ति
प्रदान करूंगी ताकि तुम उन तक पहुँच सको. वो ही तुम्हारी सहायता कर सकते हैं. ये
बोल के वो अदृश्य हो गयी.
लोखड़ी ने देखा की उसके बंधन खुल गए हैं और उसको पंख निकल आये हैं. उसने
तेज़ी से उड़ना चालु किआ और बादलों को चीर के नभदेव के पास पहुंचा. नभदेव बोले, ये
दूसरी बार है जब कोई जीव यहाँ आया है. लोखड़ी ने दंडवत प्रणाम किआ. “मुझसे मिलने तो
नहीं आये हो, कुछ तो चाहिए तुम्हे” देव बोले. लोखड़ी बोली, प्रभु आप ने जो दिव्य
पुष्प बंदरो को दिए था, कुछ ही वर्षो में उन्होंने उसका दुरूपयोग चालू कर दिए. सभी
जीव जंतु भयभीत हैं और समस्या के निवारण के लिए भूदेवी ने मुझे यहाँ भेजा है.
“तुमने तो आते ही अपनी पहुँच दिखा दी! ये बताओ क्या चाहते हो?” नभदेव ने बोला. लोखड़ी
बोली की आप कृपा कर के वो पुष्प वापस ले लीजिए. नाभदेव ने बोला, “एक बार जो मैने
दे दिआ वो दान मैं वापस नहीं लेता.” लोखड़ी बोली फिर तो भूदेवी बहुत क्रोधित होगी.
देवी के क्रोध से देव परिचित थे इसलिए बोले, “देखो मैं वो वापस तो नहीं ले सकता
लेकिन तुम्हे एक वरदान देता हूँ. पुष्प को सक्रिय करने के लिए 4 बंदरो की आवश्यकता
है. उसके बिना पुष्प शक्तिहीन है. मैं तुम्हे ऐसी विषैली साँस प्रदान करता हूँ जिस
के दुष्प्रभाव से बंदरो का नाश होगा. मगर ये विष तभी कारगर होगा अगर कम से कम
3 बन्दर आस पास हो. इस प्रकार वो कभी
दिव्या पुष्प प्रयोग नहीं कर पाएंगे.” इतना वरदान प्राप्त कर लोखड़ी को सतोष हुआ और
वो सुन्दरवन लौटी. गधो ने उसे आकाश से उतरते देखा और आश्चर्यचकित रह गए. उनके पूछने पर लोखड़ी ने उन्हें पूरा घटनाक्रम बतलाया और कहा कि भू देवी के आषीर्वाद
और नभदेव के वरदान से अब वो सब ठीक कर देगी. गधे ने सोचा उन्हें भी भू देवी की पूजा
कर के कम से कम सींघ माँग लेनी चाहिए मगर वह फिर कभी.
उसके बाद क्या था, अपनी विषैली साँस से लोकड़ी ने बन्दरो में हड़कंप मचा दिया,
जैसे ही चार बन्दर दिव्या पुष्प के पास इकट्ठे होते, लोखड़ी की विषैली श्वास से निर्जीव
हो के गिर पड़ते. बंदरो को समझ आ गया की अब उनके एक छत्र राज्य का अंत हो गया है. कही
भी दो से ज़्यादा बन्दर इकट्ठे नहीं हो सकते थे वरना लोखड़ी का भय रहता. समय के साथ उनका
पूरा मनोबल टूट गया. उन्होंने अपने पुराने मित्रों – गाय, बकरी और घोड़ो से दया याचना
करी किन्तु किसी ने भी उनकी कोई सहायता नहीं की.
इसी प्रकार लोखड़ी के विष से डरते हुए बंदरों ने कई साल बिता दिए. वो चुप चाप
अपनी गुफा में ही रहने लगे और दिव्य पुष्प से जो दिव्यता मिली थी उसे भूल गए.
इस प्रकार बिखर गए की आपस में बैठ के बात करने से भी कतराते. वे अपनी सभी संभावनाओं
को भूल बैठे. धीरे धीरे उनकी सख्या कम होने लगी और यदा कदा ही वो किसी को दिखाई देते
थे.
एक दिन गधे के बच्चे ने एक मरियल से बन्दर को देख के पुछा, “माँ ये क्या है?”
गधे की माँ ने बोला, कुछ नहीं बच्चे, ये बस एक घबराया हुआ गुफा का बन्दर है.
अभी वहीँ छिप के बैठ जाएगा.
2020